राजा पृथक चरित्र

मुनियों ने कहा लामा हर्ष वाणी जी पृथक के जन्म की कथा विस्तार पूर्वक कहिए उन महात्मा ने इस पृथक का किस प्रकार दोहन किया था लोन हर्षवर्धन जी बोले दो जनों में वे कुमार पृथक किया कथा विस्तार के साथ सुनाता हूं आप लोग एकाग्रचित होकर सुने ब्राह्मण जो पवित्र नहीं रहता इसका हृदय कोटा है जो अपने शासन में नहीं है जो व्रत का पालन नहीं करता तथा जो कृतार्थ और अहित कार्य है ऐसे पुरुषों को माया प्रसन्न नहीं सुनना सकता यह स्वर्ग देने वाला यस और आयु की वृद्धि करने वाला परम धन्य वेदों के तुल्य मानवीय तथा गुण रहस्य है ऋषियों मुनियों जैसे कहना है वह सब में गेहूं का क्यों सुना रहा हूं सुनो जो प्रतिदिन ब्राह्मणों को नमस्कार करके व्हेन कुमार पृथक चरित्र का विस्तार पूर्वक कीर्तन करता है वह समझ कम मैंने किया और अशोक नहीं किया इसका बात का शौक नहीं होता पूर्व कल की बात है अति कल में उत्पन्न प्रजापति और बड़े धर्मात्मा और धर्म के रक्षक थे यात्री के समान ही तेजस्वी थे उनका पुत्र वन था जो धर्म के तत्वों को बिल्कुल नहीं समझता था उनका जन्म मृत्यु कन्या सुनीता के गर्व से हुआ अपने नाम के इस भाविक दोष के कारण वह धर्म को पीछे रखकर काम और लोभ में प्रवत हो गया उसकी धर्म की मर्यादा भ्रष्ट कर दी गई और वैदिक धर्मात्मा उल्लंघन करके वह धर्म में तात्पर्य हो गया विनाश कल उपस्थित होने के कारण उसने यह क्रूर प्रतिज्ञा कर ली थी कि किसी को यज्ञ और हम नहीं करने दिया जाए या जन्म करने योग्य यज्ञ करने वाला तथा यज्ञ भी नहीं यज्ञ भी मैं मैं ही हूं मेरे लिए यज्ञ करना चाहिए मेरे ही उद्देश्य से हवन होना चाहिए इस प्रकार मर्यादा का उल्लंघन करके सब कुछ ग्रहण करने वाले आरोग्य वान से मर्जी जाती तब महर्षियों कहना वान हम अनेक वर्षों के लिए यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करने वाले तुम आधार बना करो यह यज्ञ आदि कार्य स्थान सनातन धर्म है महर्षियों को यूं कहते देख गोटी बुद्धि वाले वन हंस कर कहा अरे मेरे सिवाय दूसरा कौन धर्म का रिश्ता मैं किसी बात से सुनो बिटिया पराक्रम तपस्वी और सत्य के द्वारा मेरी सामान्य करने वाले इस भूतल कौन है माही संपूर्ण प्राणियों की और विशेषता सब धार्मिकता उत्पीता कारण है तुम सब लोग मूर्ख और अचेत हो इसलिए मुझे नहीं जानती यदि मैं चाहूं तो इस पृथ्वी को भस्म कर दूं जाल में बहा दूं या भूलोक तथा घूम लोग में रहो इससे तनिक भी अन्यथा विचार करने अवस्था नहीं है जब महर्षि गार्डन को मुंह और आश्रम किसी तरह हाथ न कर सके तब उसे बड़ा क्रोध हुआ उन महाशिव एवं बाली बहन को पकड़ कर भाग दिया लिया या उसे समय वह बहुत झलक खुद कर पहुंचा तथा महर्षि को पित्त को कार्बन बायो जर्मन था करने लगे इसके एक कल और रंग के पुरुषार्थ हुआ जो बहुत से नाता था वह भयभीत हो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया इसी व्याकुल देख अत्री ने कहा भी सीट बैठकर जाए इसके विनाश वाद का परिवर्तन हुआ और पेन को आप ने उत्पन्न हो गया धिरौली सृष्टि करने लगा तत्पश्चात मानताओ ने पुणे हरीकरण भारतीय वन की विधायक भुज मंथन किया उस आखिरी समान तेजस्वी पृथक प्रदूत हुआ हुए भयानक टैंकर करने वाला अजगर नमक धनुष दिव्या बाढ़ तथा रखी वचन धारण किए प्रकट हुए थे उनके उत्पन्न होने पर समस्त प्राणी बड़े प्रसन्न हुए और सब और से वहां एकत्रित होने लगे व्हेन स्वर्गीय गामी हुआ महात्मा प्रीति जैसे सनातनी पुरुष ने उत्पन्न होकर पेन को पुरुष नामक नरक से छुड़ा लिया तथा उनका अभिषेक करने के लिए समुद्र और सभी इंद्रियां नदी रत्न एवं जल लेकर स्वयं में उपस्थित हुए आदिश्रा देवताओं के साथ भगवान ब्रह्मा जी तथा समस्त चराचर भूतों वहां जाकर राजा पृथक राजा अभिषेक किया वह महाराज सभी प्रजा का मनोरंजन किया उसके विधान प्रजा को बहुत दुखी किया ताकि तू पिता कौन सबको प्रसन्न कर लिया राजा का मनोरंजन करने के लिए कारण ही उनका नाम राजा हुआ वह सब समुद्र की यात्रा करते तब उनके जाल स्थिर हो जाता पर्वत उन्हें जानने के लिए मार्ग दे देते थे और उनके रति की ध्वजा कभी बाढ़ नहीं हुई उनके राजाओं में पृथ्वी बिना जोत बाय ही आंध्र पैदा करती थी राजा का चिंतन करने मात्र से आंध्र सिद्ध हो जाता था सभी और गांव में कामधेनु बना रहे थे और पत्र से देने मधुर भरा जाता था उसी समय पृथ्वी ने बेतरहा ब्रह्मा जी से संबंध रखने वाल यज्ञ किया उसे सोम अभिषेक दिन सूती सोमराज निकालने की भूमि एक परम बुद्धिमान शुद्धि की उत्पत्ति हुई इस महायज्ञ में विद्यमान मार्गदर भी प्रस्ताव हुआ उन दोनों ने महर्षियों पिता की स्तुति करने के लिए बुलाया और कहा तुम लोग इन महाराज की स्तुति करो यह कार्य तुम्हारे अनुरूप है और यह महाराज भी इसके योग्य पात्र है यह सुनकर सूट और मांग दाने उसे महर्षि से कहा हम अपने कर्मों से देवताओं तथा ऋषियों को प्रसन्न करते हैं इस महाराज का नाम कर्म लक्षण या यश कुछ भी हमें याद नहीं है जिससे इस तेजस्वी नरेश की हम स्तुति कर सके तब स्त्रियों ने कहा भविष्य में होने वाले गुना का उल्लेख करते हुए स्तुति करो उन्होंने वैसा ही किया उन्होंने जीवन कर्म बताएं उन्हें को महाबली पृथक पीछे से पूर्ण किया तभी से लोग ने सूती मार्ग एवं वादी जनों के द्वारा आशीर्वाद दिलाने की परिपथ चल पड़ी वे दोनों जब स्तुति कर चुके तब महाराज पृथ्वी अत्यंत प्रसन्न होकर अनूप देश का राजा सूती और मार्ग का मार्ग को दिया पृथ्वी देखकर अध्ययन प्रसन्न हुए प्रजा से महर्षि ने कहा यह महाराज तुम्हारे जीविका प्रदान करने वाले होंगे या सुनकर सारी प्रजा माता राजा पृथ्वी और दौड़ और बोली आप हमारे लिए आजीविका प्रबंध कर दें आप राजाओं ने उन्हें इस प्रकार घेरा तब हुए उनके हित करने की इच्छा से धनुष बाण हाथ में ले पृथ्वी की ओर छोड़ दौड़े पृथ्वी उनके भाई से थरथराव की कारों का रूप धारण करके भाग तब पृथ्वी एवं धनुष लेकर भागती हुई पृथ्वी पीछा किया पृथ्वी उसके भाई से ब्रह्मलोक आदि अनेक लोगों में गए किंतु जब जहां उसकी धनुष मिली हुई पृथ्वी को अपने आगे देखा आगरा के समान प्रज्वलित दिखे बड़ों के कारण उनका तेज और बेवुड़ी दिखाई देता था एवं महान योगी महंत महात्मा देवताओं के लिए भी दुर्वासा प्रतीत होते हैं तब और कहीं रक्षा ना हो सकी तब तीनों लोगों की पूजनीय पृथ्वी हाथ जोड़कर फिर महाराज पृथ्वी ही शरण में आए और इस प्रकार बोले राजा सब लोग मेरे ही ऊपर स्थिर है मैं ही इस जगत को धारण करती हूं यदि मेरा नाश हो जाए तो समस्त प्रजा नष्ट हो जाएगी इस बात को अच्छी तरह समझ लेना भोपाल यदि तुम प्रजा का कल्याण चाहते हो तो मेरा वध ना करो मैं जो बात कहती हूं उसे सुनो ठीक उपाय से आरंभ किया हुआ सब कार्य सिद्ध होंगे तुम उसे उपाय ही दृष्टि करो इससे इस प्रजा जीवित रह सकोगे मेरी हत्या करके भी तुम प्रजा के पालन पोषण में समर्थ ना होंगे महात्मा तुम क्रोध त्याग दो मैं तुम्हारे अनुकूल हो जाऊंगा तीर्थ योगी भी स्त्री को आवश्यक बताया गया यदि यह बात सत्य है तो मैं तुम्हारा धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए पृथ्वी ने कहा भाद्र जो आपने यह पर आए किसी एक के लिए बहुत से प्राणियों का वध करता है उसे अत्यंत ताकत लगता है परंतु यह ससुधिया व्यक्ति का वध करने वाला बहुत से लोग सुखी हो उसके मरने से पता किया उत्पाद कुछ नहीं लगता आता वसुंधरा में प्रजा का कल्याण करने के लिए तुम्हारा वध करूंगा यदि मेरे कहने से आज संसार का कल्याण नहीं करोगे तो अपने बाढ़ से तुम्हारा नाश कर दूंगा और अपने को ही पृथ्वी रूपी प्रकट करके स्वयं ही प्रजा को धारण करूंगा इसलिए तुम मेरे आजा मां कर समस्त प्रजा की जीवन रक्षा करो क्योंकि तुम सबके धारण में समर्थ होगी समय मेरी पुत्री बन जाओ तभी मैं इस प्राचीन पहाड़ों में तुम्हारे वाद के लिए उगत है रॉक रहूंगा पृथ्वी बोली फिर इतनी संदेह में जब यहां कुछ करूं मेरे लिए कोई बछड़ा देखो इसके प्रति उसने युक्त होकर मैं दूध दे सकूं धर्म महात्माओं में श्रेष्ठ भूगोल तुम मुझे सब और बराबर कर दो जिससे मेरा दूध सब और वह सके तब राजा पृथ्वी अपने धनुष की नोक से लाखों पर्वतों को उजाड़ और उन्हें एक स्थान पर एकत्रित किया इस पर्वत मर गए इससे पहले की सृष्टि भूमि समतल ना होने के कारण अथवा ग्रामों का कोई सीमावर्ती विषय नहीं हो सका था उसे समय आंत्ररूखी खेती और व्यापार भी नहीं होते थे यह सब तो वे कुमार पृथ्वी के समय से ही आरंभ हुआ भूमिका जीवन भाग समतल था वही वही पर समाप्त प्रजा ने निवास करना पसंद किया वह सम आज तक प्रजा का हर केवल फालतू मूल ही था और वह भी बड़ी कठिनाई से मिलता था राजा बूढ़े में स्वयं विष्णु बछड़ा बना कर अपने हाथ में ही पृथ्वी को दुआ उसे पता भी नर से पृथ्वी से सब प्रकार के यंत्रों का दोहन किया इस मंत्र से आज भी सब प्रजा जीवन धारण करती है उसे समय स्त्री देवता भीतर नाग दे दिया यक्ष पुराना टेकानदारों पर्वत और वृक्ष सामने पृथ्वी को दुआ उसके बछड़े दूध बछड़ा पत्र और धोने वाला यह सभी पृथ्वी पृथक पृथक थे स्त्रियों ऋषियों के चंद्रमा बछड़े बने बृहस्पति ने दुल्हन का काम किया तब फोन ब्रह्मा उनका दूध था आयुर्वेद ही उनके पत्र द देवताओं ने स्वर्णमणि पत्र लेकर पुस्तक दो दोहा उसके लिए इंद्र बछड़ा बने और भगवान सूर्य ने धोने का काम किया पितरों का चांदी का पत्र था प्रतापी एवं बछड़ा बने अंत करने दो दुआ उसके दूधों को शुरुआत नाम दिया गया नागों ने तर्पणों से बछड़ा बनाया तांबे का पत्र का ही रावत नाग से धोने का काम लिया और ₹20 दूध का दोहन किया असुरों ने मधु दूध वाला बना उसे माया में दूध दोहा और उसे समय भी रोजन बछड़ा बना था और लोहे के पत्र में दूध दोहा गया था पत्र था कुबेर बछड़ा बने थे रजत नाम यश धोने वाला था और आंध्र ध्यान होने की विद्या की उनका दूध था रक्षा सेट्रियों से अनुमूलित नामक राक्षस बछड़ा रजत नमक धोने वाला था उसे कल रूपी पत्र में शोषण आंदोलन किया गंधर्व विचित्र बछड़े का काम पूरा किया कमाल ही उनका पत्र था सुरक्षित धोने वाला तथा पवित्र दूध ही उनका दूध था पर्वतों में महावीर को बछड़ा बनाया और स्वयं ढूंढने वाला बनाकर शीला में पत्र मेरठ में एवं औषधीय का दूध के रूप में दोहा वर्षों में पलाश पड़ा बछड़ा था खिले हुए साल की वृक्ष धोने का काम किया पलाश का पत्र था और जलने का तथा काटने पर पुणे आकर्षित हो जाने की उनका दूध था इस प्रकार सबका धारण पोषण करने वाली यह पवन वसुंधरा समस्त चराचर जगत की आधारभूत तथा उपस्थित स्थान है यह सब कामनाओं को देने वाले तथा सब प्रकार की यात्रियों को अनोखी करने वाले गौरव का पृथ्वी मोड़नी के नाम से विख्यात है या समुद्र पृथ्वी के अधिकार में थी माधुरी और गेट भट्ट के मैदे से ब्याज होने के कारण यह मदनी कहलाती है फिर राजा पृथक की आज्ञा के अनुसार भूदेवी उनके पुत्री बन गई इजराइल से पृथ्वी में रहते हैं पुराने इस पृथ्वी का विभाग शोध किया जिससे यह आंतरिक अली खान एवं शांति सली बनी गई गांव आओ नगरों के कारण इसकी बड़ी शोभा होने लगी व्यवस्था कुमार महाराज पृथ्वी ऐसा ही प्रभाव था इस संदेह नहीं किया समस्त प्राणी के पूजनीय और बेदनी वेद पहाड़ों पर्वत विधान ब्राह्मणों को भी महाराज पृथक की वंदना करनी चाहिए क्योंकि वह सनातन ब्रह्मा यानी है राज की इच्छा रखने वाले राजाओं के लिए भी परंपरा भी महाराज पृथ्वी ही हुए देनी है शुद्ध में विजय की कामना करने वाले पराक्रमी योद्धाओं को भी उन्हें मस्तक झुकना चाहिए क्योंकि युद्ध में वह अग्रणीय थे जो सैनिक राजा पृथक नाम लेकर संग्राम में जाता हुआ भयंकर संग्राम में भी सकुशल लौटा है और यह जैसी होता है वैसे रीति करने वाले धनी पेशियां को भी चाहिए यदि वह महाराज पृथक को नमस्कार करें क्योंकि राजा पृथक सब के वृद्ध डाटा और परम तेजस्वी थे इस संसार में परम कल्याणी की इच्छा रखने वाले तथा तीनों वाहनों में सेवा में लगे रहने वाले पवित्र शूद्रों के लिए भी राजा पृथक युवा देनी है इस प्रकार जहां पृथ्वी को धोने के लिए विशेष विशेष बछड़े ढूंढने वाले दो तथा पत्र कल्पित किए गए थे उन सबका मैं वर्णन किया
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King Vilekh Charitra
The sages said, Lama Harshvani, please tell the story of Vilekh's birth in detail. How did that great man exploit this Vilekh? Harshvardhan said, he separated the prince into two people. I will narrate the story in detail. You all listen carefully. A Brahmin who is not pure, his heart is a quota. He who is not in his own rule, who does not observe fasts, and who does evil and harmful deeds, such men cannot be pleased by Maya. This one who gives heaven, gives fame and increases longevity, is the most blessed human being and is a secret of virtues equal to the Vedas. Why am I telling you this, as the sages and saints say, one who daily salutes the Brahmins and sings the detailed kirtan of Vilekh Charitra, he does not understand the understanding that I did less and Ashoka did not do it. I do not like to talk about it. It is a matter of yesterday. Prajapati was born in the very past and was a great virtuous man and protector of religion. He was as radiant as a traveler. His son was Van, who did not understand the principles of religion at all. His birth and death were due to the pride of the daughter Sunita. This emotional defect of his name Due to this, he left religion behind and got involved in lust and greed. The limits of his religion were corrupted and by violating the Vedic religious principles, he became obsessed with religion. Due to the presence of destruction tomorrow, he took this cruel vow that no one should be allowed to perform yagya or anyone who is worthy of being born to perform yagya and not even yagya, the yagya is me only, the yagya should be performed for me only, the havan should be done for my purpose only. In this way, by violating the limits, the healthy Van who accepts everything got his way, then he said to the Maharishis that we, who have taken initiation in yagya for many years, you should make this the basis, this place of yagya etc. is Sanatan Dharma. Seeing the Maharishis saying this, the Van with a small intellect laughed and said, hey, who else other than me is related to religion, listen daughter, who is the one who makes me normal through bravery, asceticism and truth, who is the reason for oppression of all the creatures on this earth and the speciality of religion? All of you are foolish and unconscious, that is why you do not know me. If I wish, I can burn this earth to ashes, sweep it away in the net or destroy the earth and the people roaming among you. Be it, there is no condition to think otherwise than this. When Maharshi Garg could not touch his face and ashram in any way, then he got very angry and caught hold of Maharshi and Bali and ran away. At that time he reached there with great enthusiasm and started giving carbon bio germs to Maharshi. After this, efforts of one more color were made by him, who had many relations with him, he got scared and stood with folded hands. Seeing this distraught, Atri said to sit down and go. His destruction plan changed and Pen was born. Dhirauli started creating the world. After that, Manta churned the Bhuj, the creator of the forest of Pune Harikaran Indian. That last, a radiant and equally brilliant individual, a terrible tanker-like python, salt, bow, divine flood and holding the sacred words, appeared on his birth, all the creatures were very happy and started gathering there from all sides. When Mahatma Preeti was born, a Sanatani man like him was born and freed Pen from the hell called Purusha and for his anointment, the ocean and all the senses, rivers, gems and water appeared with Lord Brahma and all the Adisra gods along with him. The living and non-living beings went there and anointed the king. That king entertained all the subjects. His rules made the subjects very sad so that the father pleased everyone. For the sake of entertaining the king, his name was Raja. Whenever they traveled to the sea, their nets would become stable. The mountains would give them directions and the flag of their love never flooded. In their kings, the earth would produce Andhra without plowing. Andhra would become Siddha just by thinking of the king. Kamadhenu was made in all the villages and the offerings were filled with sweets. At the same time, the earth performed a Yagya related to Brahma Ji. On the day of Soma Abhishek, a highly intelligent person was born from the land of Somaraj. The leader present in this Mahayagna was also present. They both called the Maharishis to praise the father and said that you all should praise this Maharaj. This work is suitable for you and this Maharaj is also worthy of this. Hearing this, Suit and Mang Daane said to the Maharishi that we please the gods and sages with our deeds. The name of this Maharaj, Karma, Lakshan or Fame, whatever it may be. We do not remember any way by which we can praise this brilliant king. Then the women said praise him by mentioning the good deeds that he would do in the future. He did the same. He told them about his life deeds. Mahabali completed it from behind. From then on, people started going around to get blessings from the people of Suti Marg and the valley. When they both finished praising, Maharaj Prithvi became very happy and gave the path of the king of Anup country to Suti and the path. Seeing Prithvi, the Maharishi was pleased and said to the people, this king will be the one who will provide you livelihood. Hearing this, all the people ran towards King Prithvi and said, you should arrange livelihood for us. The kings surrounded him in this way. Then, with the desire to do good to them, Prithvi took bow and arrow in his hand and ran towards Prithvi. Prithvi ran away from his brother, taking the form of shaking cars, Prithvi and running with the bow, Prithvi chased his brother. Prithvi went to Brahmalok and many other places but whenever he saw Prithvi in front of him with his bow, he appeared blazing like Agra.Due to the elders, his brilliance and foolishness were visible and the great yogi, Mahant Mahatma, appeared as Durvasa even for the gods, when there was no protection anywhere else, then the earth, worshipped by the three worlds, folded his hands and then Maharaj Prithvi took refuge in him and said thus, King, all the people are dependent on me only, I am the one who sustains this world, if I get destroyed then all the people will be destroyed, understand this thing very well Bhopal, if you want the welfare of the people then do not kill me, listen to what I say, all the work started with the right solution will be accomplished, you should look at it as a solution only, with this the people will be able to survive, even after killing me you will not be able to support the people, Mahatma, you should give up your anger, I will be in your favor, Tirtha Yogi is also said to be necessary for women, if this is true then I should not abandon your religion, Prithvi said Bhadra, the one who has come here and kills many creatures for one person, he feels immense power, but the one who kills this virtuous person, many people become happy, it is known from his death that nothing happens for the welfare of the people in Vasundhara. I will kill you for this. If you do not do good to the world today as per my request, then I will destroy you with my flood and by revealing myself as the earth, I will myself sustain the people. Therefore, come to me mother and save the lives of all the people because you will be capable of sustaining everyone. Become my daughter, only then will I rise in these ancient mountains for your sake. The earth said then in such a doubt when I should do something here, look for a calf for me so that I can give milk. She said, O best among the religious saints, you make me equal to all the mountains so that my milk can be given to all. Then King Prithvi destroyed lakhs of mountains with the tip of his bow and gathered them at one place. These mountains died. Before this, due to the land not being flat, there was no boundary of the villages. At that time, there was no internal farming and trade. All this started from the time of Kumar Prithvi. The land of life was flat and it ended there only. The people liked to live there. Till today, the food of the people was only useless and that too was available with great difficulty. In the old king, Vishnu himself became a calf. Taking the earth in his own hands, he knew that man exploited all kinds of machines from the earth with this mantra, even today all the people sustain life, time, woman, god, snake was given inside, Yaksha, old pillars, mountains and trees in front, blessing the earth, its calf, milk, calf, leaf and washer, all these earths were separate, the moon of women and sages became the calf, Brihaspati did the work of the bride, then phone Brahma was their milk, Ayurveda was their leaf, the gods took the book and gave two couplets, Indra became the calf for him and Lord Surya did the work of washing, the silver leaf of ancestors was powerful and the calf became the end, let the dua, his milk was given the name Shuruaat, the snakes made a calf from Tarpans, the work of washing was taken from Rawat snake of copper leaf and milk was exploited for ₹20, the demons made Madhu the milkman, milked him in Maya and time was also made of him, the calf was made of milk every day and milk was milked in the iron leaf, the leaf was made of Kuber, the calf was made of silver, the washerman was named as Yash It was and Andhra was the knowledge of meditation, their milk was the demon calf named Anumulita from the defense sets, who used to wash silver salt, he exploited it in the form of a leaf, Gandharva completed the work of the strange calf, his leaf was amazing, it was the safe washer and the pure milk was his milk, in the mountains he made Mahavir a calf and made him a finder himself, leaf in the stone, Meerut and in the form of medicinal milk, in the years Palash was a calf lying, it used to wash the blooming Sal tree, the leaf of Palash was and its milk was burning and attracting flame on cutting, in this way this windy Vasundhara which sustains everyone is the basic and present place of the entire animate and inanimate world, this earth which fulfils all the wishes and is unique to all types of travelers, is famous by the name of Modni or the ocean was in the control of the earth, due to the interest on the flour of Madhuri and Gate Bhatt, it is called Madni, then as per the order of King Vishreshtha, Bhudevi became his daughter, people from Israel live on earth, department of this earth was researched due to which this internal Ali Khan And the peace became a place, because of the villages and cities, it started becoming very beautiful. There was no doubt that the system of Kumar Maharaj Prithvi had such an effect. Brahmins should also worship Maharaj Prithvi because he is the eternal Brahma, that is, the tradition for the kings who desire to rule has also been given to Maharaj Prithvi. The mighty warriors who desire victory in the pure should also bow their heads to him because he was the leader in the war. The soldier who goes to the battle with the name of King Prithvi has returned safely even in the fierce battle. And as it happens, the rich people who follow the same rituals should also salute Maharaj Prithvi because King Prithvi was the oldest of all and was extremely bright. In this world, for those who desire ultimate welfare and for the pure Shudras who are engaged in the service of the three vehicles, King Prithvi is to be given a young King. In this way, where two and three letters were imagined to find special calves to wash the earth, I have described all of them.
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