तथा अनाड़ी द्वितीय त्रिगुण वत इत्यादि भगवान के वचनों में भी क्षेत्र यज्ञ नीति ईश्वर तत…
पता या सिद्ध हुआ कि जो वास्तव में ईश्वर ही है उसे क्षेत्र यज्ञ को अभी दिया द्वारा आरोप…
तू समस्त क्षेत्र में प्रयुक्त लक्षणों से युक्त क्षेत्र यज्ञ भी मुझे अंसारी परमेश्वर को…
सातवें अध्याय में ईश्वर दो प्रकृतियां बतलाई गई है पहले आठ प्रकार के विभक्ति त्रिकोण आद…
तथा जो सदा ही संतुष्ट है अर्थात स्थिति के कारण स्वरूप पदार्थ की लाभ हानि में जिसके जो …
परंतु यदि तू ऐसा करने में भी अर्थात जैसा ऊपर कहा है उसे प्रकार मेरे लिए कम करने के पार…
उनको क्लेश अधिकतर होता है यद्यपि मेरे लिए ही कर्म आदि करने में लगे हुए साधकों को भी बह…
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