राजा सगरका चरित्र तथा इसरो को वंश के मुख्य मुख्य राजाओं का परिचय

लोन हर्ष वाणी जी कहते थे राजकुमार सत्यव्रत भक्ति दया और प्रतिज्ञा वास विन पूर्वक विश्व मित्र जी स्त्री का पालन करने लगा इससे मुनि बहुत संतुष्ट हुए उन्होंने सत्यव्रत से इच्छा अनुसार वर मांगने के लिए कहा राजकुमार बोला मैं इस शरीर के साथ ही स्वर्ग लोक में चला जाऊं जब आण्विष्ट का भाई दूर होगा तब विश्व मित्र ने उसके पिता की राज पर अभिषेक करके उसके द्वारा यज्ञ कराया वह महत्व पशु भी थे उन्होंने देवताओं तथा वशिष्ठ के देखते-देखते सत्यव्रत को सर सहित स्वर्ग लोक में भेज दिया उसकी पत्नी का नाम सत्य रखा था वह के कई कल की कन्या थी उसे हरिश्चंद्र नामक निष्पत पुत्र को जन्म दिया राज सूर्य यज्ञ का अनुष्ठान करने से सम्राट कहलाए हरिश्चंद्र के पुत्र का नाम रोहित था रोहित के हरित और हरित के पुत्र चाचू हुए चाचू के पुत्र का नाम विजय था वह संपूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के कारण विजय कहलाते विजय के पुत्र राजा रूप हुआ जो धर्म और आधार के ज्ञाता थे गुरु रूप के वाकरा वाकरा के बहू और बहू के सागर हुए वह घर अर्थात विश्व के साथ प्रकट हुए थे इसलिए उनका नाम सागर हुआ उन्होंने ब्रिंग वंशी और मनी से अज्ञानेश अस्त्र प्राप्त कर टाल जड़ और है या नमक क्षत्रियों को युद्ध में हराया और समूची पृथ्वी पर विजय प्राप्त की फिर शक पहन तथा पर्दों के धर्म का निराकरण किया मुनियों ने पूछा सागर की उत्पत्ति गर्ग के साथ कैसा हुआ उन्होंने क्रोध में आकर्षक अर्थ आदि मा तेजस्वी क्षत्रियों के कुल्चित धर्म का निराकरण क्यों किया यह सब विस्तार पूर्वक सुनेंगे लॉन्ग हर्षण जी ने कहा राजा बहु बिश्नोई थे अतः पहले हर्षित नमक छतरियां ने लाफ्टर जड़ों और सोनू की सहायता से उनका राज छीन लिया यादव प्रदत का बोझ तथा हवन नाम के गणेश भी है जो के लिए पराक्रम दिखाया राज चीन जाने पर राजा बहुत दुखी हो पत्नी के साथ वन में चले गए वहीं उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए बहू की पत्नी आदमी गर्भवती थी वह भी राजा का सहगमन करने को प्रस्तुत हो गई उन्होंने उनकी सौतन ने पहले से ही जहर दे रखा था उन्होंने वन में चिंता बनाई और उसे पर अरुण को पति के साथ भस्म हो जाने का विचार किया युगवंशी ओम मनी को इस दशा पर बड़ी दया आई उन्होंने रानी को चिंता में जलने से रोक दिया उन्होंने आश्रम में वह गर्व जहर के साथ ही प्रकट हुआ वह महाराज सागर हुए ओनर ने बालक के जाट कर्म आदि संस्कार किए हुए शास्त्र पढ़े तथा ग्रे वस्त्रक भी प्रदान किया जो देवताओं के लिए भी दुख है उसने सागर एवं है या वंशी क्षत्रियों का विनाश किया और लोक में बड़ी भारी करती पाई दादू प्रांत उन्होंने सब यह जन्म कमल प्रधान तथा मा परियों का सर्वनाश करने के लिए उद्योग किया वीर कुंवर महात्मा सागर की मार्ग पड़ने पर हुए सभी महर्षि वशिष्ठ की शरण में गए और उनके चरणों पर वीर पड़े तब मा तेजस्वी वशिष्ठ ने उसे शर्ट के साथ उन्हें अभय दान दिया और राजा सागर को रोका सागर ने अपनी प्रतिज्ञा तथा गुरु के वचन का विचार करके केवल उसके धर्म का निराकरण किया और उनके वेश बदल दिए शकों के आधार आधे मस्तक को बुलाकर विदा कर दिया यो और कमजोरी का सर सर मुंडा दिया परतों की सैर कैसे उड़ा दिए धर्म विजय राजा सागर इस पृथ्वी को जीतकर अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली और अशोक को देश में बिछड़ने के लिए छोड़ा वह अश्व का जब पूर्ण दक्षिण समुद्र के तट पर विचार रहा था उसे समय किसने उसको चुरा लिय और पृथ्वी के भीतर छिपा दिया राजा ने अपने पुत्रों से उसे प्रदेश को खुदवाया महासागर की खुदाई होते समय उन्होंने वह आदि पुरुष भगवान विष्णु को जो हरि कृष्ण और प्रजापति नाम से प्रसिद्ध है महर्षि कप कपिल के रूप में स्वयं करते देखा जैन पर उसके नेत्रों के तेज से हुए सभी जलकर भस्म हो गए केवल चार ही बचे जिसका नाम वही केतु सुखेतू धर्म रथ और पंखनाथ यही राजा के वंश चलाने वाले हुए कपिल रूप धारी भगवान नारायण ने उन्हें वरदान दिया कि राजा इस राहु का वंश अच्छा होगा और इसकी कीर्ति का भी मिट नहीं सकती भगवान ने समुद्र को सागर का पुत्र बना दिया और अंत में उन्हें अक्षय सागर वास के लिए भी आशीर्वाद दिया उसे समय समुद्र ने आधार लेकर महाराज सागर का वंदन किया सागर का पुत्र होने के कारण ही समुद्र का नाम सागर हुआ उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के उसे अश्व को पुणे समुद्र से प्राप्त किया और उसके द्वारा 100 वर्षों में किया गया के अनुष्ठान पूर्ण किया हमने सुना है राजा सागर के 60 हजार पुत्र थे मुनियों ने पूछा साधुवार सागर के 60000 पुत्र कैसे हुए हुए अत्यंत बलवान और वीर किस प्रकार हुए विलोम हर सम्मान जीने कहा सागर के दो रानी थे जो तपस्या करके अपने पाप ढक कर चुकी थी उनमें से बड़ी रानी विवादित रेशम कन्या थी उनका नाम किसने था छोटी रानी का नाम मोती था अब अशिष्ट नेवी का पुत्र तथा परम धर्म परायण थी इस पृथ्वी पर उसके रूप की सामान्य करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी महर्षि वैन ने उन दोनों को इस प्रकार वरदान दिया एक रानी 60 हजार पुत्र प्राप्त करेगी और दूसरी रानी को 100 पुत्र होगी किंतु वह वंश चलाने वाला होगा इन दोनों वालों में से जिसकी जिस इच्छा हो वह वहीं से ले ले तब उनमें से एक ने 60 हजार पुत्रों का वरदान ग्रहण किया और दूसरी ने वंश चलाने की एक ही पुत्र को प्राप्त करना चाह मुनि ने तथास्तु कह कर वरदान दे दिया फिर एक रानी ने राजा पैन से जीते हुए और दूसरी ने बीच से भरी हुई एक तंबू उत्पन्न हुई उसके भीतर तिनके के बराबर 6000 गर्भवती हुए समय अनुसार शुभ पूर्वक बढ़ने लग राजा ने उन सभी ग्रहों को घी से भरे हुए घोड़े में रख दिया और उनका पोषण करने के लिए प्रत्येक के पीछे एक-एक धार्मिक नियुक्ति किया तत्पश्चात क्रमशः 10 महीना में सागर की प्रसन्नता बढ़ाने वाले में वह सभी कुमार उठ खड़े हुए भजन के राजा बन गए भजन के पुत्र आयुष्मान हुए जो बड़े पराक्रमी थे उनके पुत्र दिलीप हुए जो लटका हुआ नाम से भी प्रसिद्ध थे उन्होंने स्वर्ग से यहां आकर दो घड़ी के ही जीवन में अपनी बुद्धि तथा सत्य के प्रभाव से परमार्थ साधना के द्वारा तीनों लोक गीत लिए दिलीप के पुत्र महाराज भागीरथी हुए उन्होंने नदियों में श्रेष्ठ गधा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतर कर समुद्र तक पहुंचा और उन्हें अपनी पुत्र बना लिया भागीरथी की पुत्री होने के कारण हिवड़ा को भागीरथी कहते हैं भागीरथी के पुत्र राजा स्रोत हुई स्रोत के पुत्र ना भाग हुए जो बड़े धर्मात्मा थे प्रभा के पुत्र अंबरीशा हुआ जो सिंधु दीप के पिता थे सिंह दीप के पुत्र आयु जाती हुई और आयु जाति के जाति से महा महा याजसी रितु पान की उत्पत्ति हुई जो घृत विद्या के रहस्य को जानते थे राजा रितु वर्ण महाराज नल की शाखा था बड़े बलवान थे रितु पान के पुत्र महा तेजस्वी हृतवाड़ी हुए उनके पुत्र उदास हुए जो इंद्र के मित्र थे सूरदास के पुत्रों को सूरदास बताया गया है वही कल्पवाद के नाम से विख्यात हुई तथा राजा मित्र सब ही उन्हें का नाम था कल पास उत्पादन के पुत्र सकाराम हुए सकर्मक के पुत्र अरण्य थे अरण्य के दो पुत्र हुए अमित और प्रभु अमृत के पुत्र राजा डुएट थे उनके पुत्रों का नाम दिलीप हुआ जो भगवान श्री रामचंद्र जी के प्रति पितामह थे दिलीप के पुत्र महा बहू रघु हुए जो अयोध्या के महाबली सम्राट थे रघु के अन्य और आज के पुत्र दशरथ हुए दशरथ से मा तेजस्वी धर्मात्मा श्री राम का दुष्प्रभाव हुआ श्री रामचंद्र जी के कुल एवं नाथ से विख्यात हुए उनमें से अतिवृत्त जन्म हुआ जो बड़े तेजस्वी और धर्मात्मा थे अतीत के पुत्र महाप्रक्रम में निर्दोष थे जिसका निर्दोष के नाल एवं नल के नाम हुए नाप के पूर्णांक और पुराण के कम दुआ हुए से दुआ के पुत्र महाप्रतापी देवनति द देवनति के कर्मों से अयोध्या और उन्होंने से सुदा-सुदा फिर राजा नल साल के साल से धर्मात्मा उदित उदित से बृज नाभा और ब्रजनाभा से नल का जन्म हुआ मनी वरुण एवं पुराणों में दो ही नाल प्रसिद्ध है जो एक तो चंद्रवंशी वीर सिंह के पुत्र थे और दूसरे इस राहु वंश के सुधार वीर थे कि राहु वंश के मुख्य मुख्य पुरुषों के नाम बताएं गए हैं यह सूर्यवंश के अत्यंत तेजस्वी राजा थे आदित्य नंदन सूर्य की तथा प्राजों के पोषक श्रद्धा देव मनिक इस सृष्टि पराक्रम का पाठ करने वाला मनुष्य क्षमता वान होता है और सूर्य का स्वरूप प्राप्त करता है
TRANSLATE IN ENGLISH :;
The Character of King Sagar and the Introduction of the Main Kings of the Dynasty
Harsh Vani Ji said that Prince Satyavrat, with devotion, kindness, and commitment, began to care for Vishwamitra's wife with devotion and kindness. The sage was very pleased with this and asked Satyavrat to ask for a boon of his choice. The prince said, "I will go to heaven with this body." When Anvishta's brother passed away, Vishwamitra anointed his father as king and had him perform a yajna (sacrifice). He sent Satyavrat to heaven with his head in front of the gods and Vashishtha. His wife was named Satya. She was a daughter of a very young age. She gave birth to a son named Harishchandra. By performing the Raja Surya Yajna, he was called an emperor. Harishchandra's son was named Rohit. Rohit's son was Harit, and Harit's son was Chachu. Chachu's son was Vijay. He was called Vijay because he conquered the entire earth. Vijay's son was Raja Roop, who was knowledgeable about religion and foundation. Vakra was known as Guru Roop. Vakra's daughter-in-law, and the daughter-in-law's son was Sagar. That house, that is, the world. He appeared together, hence his name became Sagar. He obtained the Ajnayesh weapon from Bhring Vanshi and Mani and defeated the Tal Jad and Hai or Namak Kshatriyas in the war and conquered the entire earth. Then he abolished the religion of Shak Pahan and Parda. The sages asked how Sagar originated with Garg, why did he in anger abolish the Kulchit religion of the attractive meaning etc. bright Kshatriyas. We will hear all this in detail. Long Harshan ji said that King Bahu was a Bishnoi, hence first Harshit Namak Chhatriyan snatched his kingdom with the help of Laughter Jad and Sonu. There is also a Ganesh named Havan who showed bravery for the king. When the king went to China, the king became very sad and went to the forest with his wife. The wife of the daughter-in-law was pregnant and she also agreed to accompany the king. Her co-wife had already poisoned her, she created a forest in the forest and thought of Arun getting burnt along with her husband. Yugvanshi Om Mani felt pity on this condition, he worried the queen. He stopped it from burning in the ashram. That pride appeared in the ashram along with poison. He became Maharaj Sagar. Honor performed the rituals of Jaat Karma etc. for the boy, read the scriptures and also gave him grey clothes, which is sad even for the gods. He destroyed Sagar and the Kshatriyas of the same clan and achieved great heinousness in the world. In Dadu province, he tried to destroy all the Kamal Pradhans and the fairies. All those who came across the path of brave prince Mahatma Sagar took refuge in Maharishi Vashistha and fell at his feet. Then the brilliant Vashistha gave him protection along with a shirt and stopped King Sagar. Sagar, considering his vow and the words of his Guru, only resolved his religion and changed his attire. On the basis of doubts, he called him with half head and sent him away. He shaved his head due to weakness. How did Dharma Vijay King Sagar destroy the layers of power? After conquering this earth, he took initiation of Ashwamedha Yagna and left Ashoka to be scattered in the country. When he was thinking about the horse on the shore of the South Sea, who stole it and hid it inside the earth. The king got his sons to dig that region. While digging the ocean, they saw the first man Lord Vishnu, who is famous by the name Hari Krishna and Prajapati, in the form of Maharishi Kapil. But due to the brilliance of his eyes, all were burnt to ashes and only four survived whose names were Ketu, Sukhetu, Dharma Rath and Pankhnath. These were the ones who would carry forward the lineage of the king. Lord Narayana in the form of Kapil gave him a boon that the lineage of this king Rahu would be good and his fame would never be erased. God made Samudra the son of Sagar and in the end blessed him to reside in the eternal ocean. At that time Samudra took support and worshipped Maharaj Sagar. Being the son of Sagar, Samudra was named Sagar. He obtained the horse of Ashwamedha Yagna from Pune sea and completed the rituals performed by him in 100 years. We have heard that King Sagar had 60 thousand sons. The sages asked how did Sagar have 60,000 sons, how did they become extremely strong and brave. Vilom Har Samman Ji said that Sagar had two queens who covered their sins by doing penance. The elder queen was the controversial Resham Kanya, whose name was Kisna, the younger queen was Moti, the son of the impure Nevi and a great devotee of religion, there was no other woman on this earth who could match her beauty, Maharishi Vaan blessed both of them in this way, one queen would have 60 thousand sons and the other queen would have 100 sons but he would be the one to continue the dynasty, whoever among these two wished could take whatever he wished from there, then one of them accepted the boon of 60 thousand sons and the other wished to have only one son to continue the dynasty, the sage said 'Tathastu' and granted the boon, then one queen conceived from King Pan and the other conceived from the middle, a tent was born, inside it 6000 children the size of straws became pregnant, they started growing auspiciously as per the time, the king kept all those planets in a horse filled with ghee and appointed one religious person behind each of them to nourish them, after that in 10 months respectively all those princes stood up in the happiness of the ocean, Bhajan became the king, Bhajan's son was Ayushmaan who was the eldest He was a brave man and his son was Dilip who was also known as Latka Hua. He came here from heaven.In his short life of just two hours, by the influence of his wisdom and truth, he took all the three world songs through spiritual practice. Dilip's son was Maharaj Bhagirathi. He brought the best of rivers, the donkey, from heaven to earth to the sea and made him his son. Being the daughter of Bhagirathi, Hivda is called Bhagirathi. Bhagirathi's son was King Srota. Srota's son was Na Bhag who was a very religious man. Prabha's son was Ambarisha who was the father of Sindhudeep. Singhdeep's son was Ayu Jati and from the Ayu Jati, the great Yajasi Ritu Paan was born who knew the secret of ghee Vidya. King Ritu Varna was a branch of Maharaj Nala and was very strong. Ritu Paan's son was the very bright Hritwadi. His son was Udas who was a friend of Indra. Surdas's sons are said to be Surdas. They became famous by the name of Kalpavada and King Mitra was also their name. Kalpas Produkta's son was Sakaram. Sakrak's son was Aranya. Aranya had two sons Amit and Prabhu Amrit's son was King Duet. The name of his sons was Dilip, who was the grandfather of Lord Shri Ramchandra Ji. Dilip's son was Maha Bahu Raghu, who was the mighty emperor of Ayodhya. Raghu's other and today's son was Dasharatha. From Dasharatha, the ill effects of the radiant, virtuous Shri Ram were born. The clan and Nath of Shri Ramchandra Ji became famous. From them, Ativrta was born, who was very radiant and virtuous. The son of Ativrta was Nirdosh in the great process, whose names were Nirdosh's Naal and Naal. From the deeds of Devanti, Dua was born, and from them, Suda-Suda, then King Naal was born. From the year of the year, the virtuous Udit was born. From Udit, Brij Nabha was born and from Brij Nabha, Nala was born. Mani Varun and in the Puranas, only two Naals are famous, one was the son of Chandravanshi Veer Singh and the other was the reformer Veer of the Rahu dynasty. The names of the main prominent men of the Rahu dynasty have been mentioned. He was the extremely radiant king of Suryavansh, Aditya's son Surya and the nourisher of the people, Shraddha Dev Manik, the mighty power of this creation. The person who recites this becomes capable and attains the form of the Sun.
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