चंद्र वंश के अंतर्गत जाहू कौशिक तथा ब्रिंग वंश का संक्षिप्त वर्णन

लूम भूषण जी कहते हैं पूर्व काल में जब ब्रह्मा जी सृष्टि का विस्तार करना चाहते थे उसे समय उसके मन से महर्षि अत्रि का प्रदोष प्रभाव हुआ जो चंद्रमा के पिता थे सुनने में आया है कि यात्री ने 3000 दिव्य वर्ष तक अंदर नाम की तपस्या की थी उसका उसमें उसका वीर्य गमी हो गया था वही चंद्रमा के रूप में प्रकट हुआ महर्षि का वह तेज पुत्र ग्रामीण होने पर उनके नेत्रों से जल के रूप में गिरा और दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगा चंद्रमा को गिरा देख लोक पितामह ब्रह्मा जी ने संपूर्ण लोक के हित की इच्छा से उसे रथ पर बैठाया रात्रि के पुत्र महात्मा सोम के गिरने पर ब्रह्मा जी के पुत्र तथा अन्य महर्षि उसकी स्तुति करने लगे स्तुति करने पर उन्होंने अपना तेज समस्त लोगों की पुष्टि के लिए सब और फैला दिया चंद्रमा ने उसे श्रेष्ठ रात पर बैठकर समुद्र पर यंत्र समूची पृथ्वी की 21 बार परिक्रमा की उसे समय उनका जो तेज चूकर पृथ्वी पर गिरा उसे सब प्रकार के मंत्र आदि उत्पन्न हुई जिसने यह जगत जीवन धारण करता है इस प्रकार मिशन के स्थान से तेज को पकड़ मा भाग चंद्रमा ने बहुत वर्ष तक तपस्या की उसमें संतुष्ट होकर ब्राह्मण देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा जी ने उन्हें बी औषधि जल तथा ब्राह्मणों का राजा बना दिया मृदुल इस स्वभाव वालों में सबसे श्रेष्ठ सोम ने वह विशाल राज्य प्रकार रसूल यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें लाखों की दक्षिणतम बाती गई उसे यज्ञ में चीनी कहो प्रीत पृष्ठ प्रभाव वासुकृत गीत तथा लक्ष्मी इन नौ देवियों ने चंद्रमा का सेवन किया यज्ञ की अंत में अभ्यास इस नाम के पश्चात संपूर्ण देवताओं तथा ऋषियों ने उसका पूजन किया राजा अधिराज सोम दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगे महर्षियों द्वारा मिश्रित विवाह दुर्लभ व्यास प्रकार चंद्रमा की बुद्धि भरता हो गई उसका विधायक का भाव दूर हो गया और अतिथि आ गए फिर तो ऐश्वर्या के मत से मोहित होकर उन्होंने बृहस्पति जी की पत्नी तारा का अपहरण कर लिया देवताओं और देव ऋषियों के बारंबार प्रार्थना करने पर भी उन्होंने बृहस्पति जी को धारा नहीं लौटी तब ब्रह्मा जी ने स्वयं ही बीच में पकड़ कर तारों को वापस कराया उसे समय वह ग्रहणी थी यह देखकर बृहस्पति जी ने कुपित होकर कहा मेरे क्षेत्र में तुम्हें दूसरे का गर्भ नहीं धारण करना चाहिए तब उसके तीन से समूह पर उसे गर्भ को त्याग दिया पैदा होते ही उसने अपने देश से देवताओं के बिहार को लज्जित कर दिया उसे समय ब्रह्मा जी ने तारा से पूछा ठीक-ठाक बताओ यह किसका पुत्र है तब वह हाथ जोड़कर बोली चंद्रमा का इतना सुनते ही राजा सोम ने उसे बालक को गोद में उठा लिया और उसका मस्तक घूमर भूत नाम रखा यह बालक बड़ा बुद्धिमान था बुद्ध आकाश में चंद्रमा से प्रतिकूल दिशा में उदित होते हैं मनी वरुण भूत के पुत्र पूर्व हुए जो बड़े विद्वान तेजस्वी नाम सेल यज्ञ करता तथा अधिक दक्षिणा देने वाले थे वह ब्राह्मण वादी पराक्रमी तथा शत्रुओं के लिए दुखी थे निरंतर अग्निहोत्र करते और आज्ञाओं के अनुष्ठान में संलग्न रहते थे सत्य बोलने और बुद्धि को पवित्र रखते थे तीनों लोक में उसके नाम तेजस्वी दूसरा कोई नहीं था हुए ब्रह्मवादी शांत धाम यज्ञ तथा सत्यवादी थे इसलिए तेजस्वी और उसने पान छोड़कर उनका वर्णन किया राजा पुरुषोत्तम उर्वशी के साथ पवित्र स्थान में 59 वर्ष तक बिहार करते रहे उन्हें महर्षि द्वारा प्रसनजीत प्रयाग में राज किया उसका ऐसा ही प्रभाव था पूर्व के साथ पुत्र हुए जो गंधर्व लोक में प्रसिद्ध और देव कुमारन के समान सुंदर थी उनके नाम इस प्रकार हैं आयु आमावसु मिश्रौ धार्मिक श्रोता बनता हुआ जो तथा वाहनों के शापूर्वासी के घरों से उत्पन्न हुए थे अमावासों के पुत्र राजा भी हुआ भीम के पुत्र कौन सा प्रभास और उसके पुत्र महाबली सुबोत्रा हुआ सुबोध रखे पुत्र का नाम जहां था जो केसरी के गर्व से उत्पन्न हुए थे उन्होंने सर्प में एक नामक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया एक बार गधा उन्हें प्रति बनाने के लोग से उसके पास गए किंतु उन्होंने अनिश्चय प्रगति कर दिया तब गाड़ी ने उसकी यज्ञशाला बहादुर यह देख जहां ने क्रोध में भरकर कहा गाड़ी में मैं तेरा जल पीकर तेरा इस पर्यटन को अभी व्यर्थ किया देता हूं तू अपने इस घमंड का फल शीघ्र पढ़ेगा योग का कारण उन्होंने गदाओं को पीला लिया यह देख महर्षियों ने बड़ी अनुवाई करके घरों को जहां की पुत्री के रूप में प्राप्त किया तब से हुए ध्यान कहने लग तत्पश्चात जहां यहोवा की पुत्री कावेरी के साथ विवाह किया यहोवा नाथ के श्राप वर्ष गड़ा अपने आधे रूप स्वरूप से सरिताओं में श्रेष्ठ कावेरी में मिल गई थी जहां कावेरी के घरों से सुगंध नमक धर्म पुत्रों को जन्म दिया शुभम के पुत्र याज की आज के बाल कक्षा और बाल कक्षा के पुत्र खुश हुए उसके देवताओं के समान तेजस्वी चार पुत्र हुए कौशिक उषा नाम कुशाब और मूर्तिमान राजा खुशी मोहन में रहकर गांववालों के साथ पहले उन्होंने इंद्र के समान पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से तब किया एक वर्ष पूर्ण होने पर इंद्र भयभीत होकर उसके पास आए उन्होंने स्वयं अपने को ही उनके पुत्र रूप में प्रकट किया उसे समय वह राजा गांधी के नाम से प्रसिद्ध हुए कुर्सी का की पुत्री पूरा थी उसी की गर्व से गांधी का जन्म हुआ गांधी का के एक परम सौभाग्यशाली कन्या हुई जिनका नाम सत्यवती था गांधी ने उसे कन्या का विवाह शुक्राचार्य के पुत्र ऋषि का के साथ किया था रितिका अपनी पत्नी से बहुत प्रसन्न रहते थे उन्होंने अपने तथा राजा गांधी के पुत्र होने के लिए पृथक पृथक चारों तैयार किया और अपने पत्नी को बुलाकर कहा सुबह इस चारों उपयोग तुम करना और इनका उपयोग अपने माता से करना तुम्हारी माता को जो पुत्र होगा वह तेजस्वी छतरी होगा लोक में दूसरे छतरी से जीत नहीं सकेगा वह बड़े-बड़े क्षत्रियों का संघार करने वाला होगा तथा तुम्हारे लिए जो शाहरुख है वह तुम्हारी पुत्रों को ढेर तपस्वी शांत पारायण एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण बनाएगा अपनी पत्नी से यूं कह कर प्रेम आनंद रितिका घने जंगल में चले गए और वह प्रतिदिन तपस्या में सालाना रहने लगे उसे समय राजा गांधी का अपनी स्त्री के साथ तीर्थ यात्रा के प्रसंग में घूमने आते हुए अंग्रेजी मुन्नी के आश्रम पर अपने पुत्री से मिलने के लिए आए थे सत्यवती ने दोनों चारों ऋषि से लिए थे उनमें उन्हें हाथ में लेकर अपनी माता का निवेदन किया उनकी माता ने देवास अपना चारों पुत्री को दे दिया और उनके चारों स्वयं ग्रहण कर लिया तदनंतर सत्यवती ने समस्त यात्रियों का विनाश करने वाला गर्भधारण किया उसका शरीर अत्यंत उदित हो गया था देखने में वह बड़ी भयानक जन्म प्राणी थी ऋषि का उसे देखने योग्य के साथ सब कुछ जान लिया और उसने कहा भद्रे तुम्हारी माता ने चारों बदलकर तुम्हें उठा लिया तुम्हारा पुत्र कठोर कम करने वाला और अत्यंत दरूद होगा तथा तुम्हारा भाई ब्रह्म होता फसी होगा क्योंकि मैं तपस्या से सर्व रूप ब्रह्म का भाव उसमें स्थापित किया था तब सत्यवती ने अपने पति को प्रसन्न करते हुए कहा उन्हें मेरा पुत्र ऐसा ना हो आप जैसे महर्षि से ब्रह्म धाम की उत्पत्ति हो या मैं नहीं चाहती यह सुनकर मुनि बोले पत्र मेरा पुत्र ऐसा हो वह संकल्प मैं नहीं किया दादा भी पिता और माता के कारण पुत्र कठोर कम करने वाला हो सकता है उसके योग करने पर सत्यवती बोली मुनि आप चाहे तो नूतन लोगों की सृष्टि कर सकते हैं फिर योग्य पुत्र उत्पन्न करना कौन बड़ी बात है आप मुझे शांति पारायण कोमल की स्वभाव वाला पुत्र देने की कृपा करें यदि चारों का प्रभाव अन्यथा ना किया जा सके तो वैसे उग्र इस स्वभाव का पुत्र भले ही हो जाए पुत्र वैसा कदापि न हो तब मुनि ने अपने तपोवल से वैसा ही करने का आश्वासन देते हुए सत्यवती के प्रति प्रसन्नता प्रकट की और कहा सुंदरी पुत्र अथवा पोत्र में कोई अंतर नहीं मानता तुमने जो कहा है वैसा ही होगा तत्पश्चात होती ने ब्रिंग वशी जल्दी को जन्म दिया और तब पढ़ाना जितेंद्रिय तथा सर्वस्त्र संभव रखने वाले थे सत्यवती भी सब धर्म में तत्पर रहने वाले पुराने तट में स्त्री थी वह कौशिक की नाम से प्रसिद्ध महानदी हुई इस राहु को वश में रेनू नाम के एक राजा थे उसकी कन्या का नाम रेणुका था रेणुका जो कमली भी कहते हैं तब और विद्या से प्रसन्न जमाती देने रेणुका के घरों से अत्यंत ब्राह्मण पशु परशुराम जी को प्रकट किया जो समस्त विधाओं में पारंगत धनुर विद्या प्रवीण क्षत्रियों खुला का संघार करने वाला तथा प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी थे रितिक के सत्यवती से प्रथम जो ब्रह्म देवताओं में श्रेष्ठ जन्मदिवस हुए मध्य पुत्र सनसेट और कनिष्ठ पुत्र सुन पूछते होने की नंद गंधरवाने विश्व मित्र को पुत्र रूप में प्राप्त किया जो तपस्वी विद्या और शांति कोई ब्रह्म ऋषि की सामान्य प्रकार वास्तव में ब्रह्म ऋषि हो गई धर्मात्मा विश्वामित्र का दूसरा नाम विश्व अर्थ था विश्वामित्र के देव रात आदि कई पुत्र हुए जो संपूर्ण विश्व में भी कहते थे उसके नाम इस प्रकार बताएं जाते हैं देवव्रत कात्यानी गोत्र के प्रवर्तक गति हिरण्याक्ष रेनू रेनू का संस्कृत गला मृदुल मधु क्षेत्र जय देवल अष्टक कश्यप और कार्तिक के सभी विश्राम मित्र के पुत्र थे इन कौशिक कौन सी महात्माओं के प्रसिद्ध गोत्र इस प्रकार है पहाड़ाइनी ब्राह्मण धन्य जाए आर्थिक देवराज सालों महाकाल लोहिया हरित और अस्त्र का ज्ञान इस वर्ष में ब्राह्मण और छतरी का संबंध विख्यात है विश्वामित्र के पुत्रों में पुणे से सबसे बड़ा माना गया है यह देवी उनका जन्म 20 दिन कल में हुआ था डीपी वह कौशिक गोत्र वाले हो गया हरीश दल के यज्ञ में हुआ पशु बनाकर लाया गया था किंतु देवताओं ने उसे विश्वामित्र को समर्पित कर दिया देवताओं द्वारा प्रदत होने के कारण वह देवर्त नाम से विख्यात हुआ देवर्त आदि विश्वामित्र के अनेक पुत्र थे विश्वामित्र की पत्नी ड्यूरेटि के गर्भ से अष्टक का जन्म हुआ अष्टक का पुत्र लोगे बताया गया है इस प्रकार मैंने गेहूं पुल का वर्णन किया है इसके बाद महात्मा आयु के वंशक का वर्णन करूंगा
TRANSLATE IN ENGLISH ::
A brief description of the Jahu Kaushik and Bringa dynasties within the Chandra dynasty.
Loom Bhushan Ji says that in ancient times, when Brahma Ji wanted to expand the universe, he was influenced by the Pradosh influence of Maharishi Atri, the father of the Moon. It is heard that the traveler had performed penance for 3,000 divine years, and his semen was lost in it. This manifested as the Moon. Seeing the Moon fall, the radiant son of the Maharishi fell in the form of water from his eyes and began illuminating all ten directions. Seeing the Moon fall, the Lord of the Universe, Brahma Ji, desiring the welfare of the entire universe, seated him on a chariot. When Mahatma Som, the son of Night, fell, Brahma Ji's sons and other Maharishi Ji began praising him. Upon their praise, he spread his radiance everywhere for the well-being of all people. The Moon, sitting on the ocean on the auspicious night, circled the entire Earth 21 times. During this time, the radiance of his energy that fell on the Earth gave birth to all kinds of mantras, etc., which sustain this world. Thus, holding the radiance from the place of the moon, the Moon remained in the chariot for many years. He performed penance and being satisfied with it, Brahma Ji, the best among Brahmin gods, gave him medicinal water and made him the king of Brahmins. Som, the best among those with mild nature, performed the ritual of Rasool Yagya like a huge kingdom in which lakhs of rupees worth of wicks were lit in the Yagya. Call it sugar, love, page effect, Vasukrit song and Lakshmi, these nine goddesses consumed the Moon at the end of the Yagya. After this name, all the gods and sages worshipped him. King Adhiraj Som started illuminating all the ten directions. Mixed marriages by Maharishis were rare. Like Vyas, the Moon's intellect became filled, his sense of deception vanished and guests came. Then, being captivated by Aishwarya's opinion, he abducted Brihaspati Ji's wife Tara. Even after repeated prayers of gods and divine sages, Brihaspati Ji did not get his flow back. Then Brahma Ji himself held the middle and brought the stars back. Seeing that she was a housewife at that time, Brihaspati Ji got angry and said that you should not conceive another woman's womb in my area. Then on her birth, she left her womb and left for Bihar of the gods from her country. As soon as she was born, she left her country for the Bihar of the gods. He was put to shame. At that time Brahma Ji asked Tara to tell him clearly whose son is this. Then she said with folded hands that of the Moon. Hearing this, King Som took the child in his lap and named him Ghumar Bhoot. This child was very intelligent. Buddha rises in the sky in the opposite direction from the Moon. Mani Varun Bhoot's son was Purva, who was a great scholar, performed yagya named Tejasvi and gave a lot of Dakshina. He was a Brahmin, brave and was sad for his enemies. He used to perform Agnihotra regularly and was engaged in the rituals of the orders. He spoke the truth and kept his mind pure. There was no one else named Tejasvi in the three worlds. He was a Brahmavadi, Shant Dham Yagya and was truthful, hence he described him after giving up betel leaves. King Purushottam lived with Urvashi in a holy place for 59 years. He was ruled in Prayag by Maharishi Prasanjit. Such was his influence. Purva had sons who were famous in Gandharva lok and were as beautiful as Dev Kumaran. Their names are as follows: Ayu, Amaavasu, Mishrau, becoming a religious listener and coming from the house of Shapurvasi of the vehicles. The sons of Amavasyas were born, the king also happened, Bhima's son was Prabhas and his son was Mahabali Subotra, Subodh was the name of the son, who was born from the pride of Kesari, he performed a great yajna named as a snake, once people went to him to make a donkey his replica but he made uncertain progress, then Gadi, the brave man of his yagnashala, seeing this, Jahan filled with anger said, I will make your journey useless by drinking your water, you will soon reap the fruits of your pride, due to yoga, he drank the maces, seeing this, Maharishis followed him with great persuasion and got Jahan's daughter in the form of Jahan, from then on he started meditating, after that Jahan married Lord's daughter Kaveri, due to the curse of Lord Nath, Gadi in her half form merged with Kaveri, the best among rivers, Jahan gave birth to sons named Sugandh and Usha from the houses of Kaveri, the sons of Shubham's son Yaj were happy, he had four sons as bright as gods, named Kaushik and Usha Living in Kushab and idol king Khushi Mohan along with the villagers, he first wished to have a son like Indra, then after one year was over, Indra came to him in fear and revealed himself as his son, at that time he became famous by the name of King Gandhi, Kursi Ka's daughter was Poora, Gandhi was born out of her pride, Gandhi had a very fortunate daughter whose name was Satyavati, Gandhi married her to Rishi Ka, son of Shukracharya, Ritika was very happy with his wife, he prepared four different types of umbrellas for himself and King Gandhi to have a son, called his wife and said, you should use these four in the morning and use them with your mother, the son your mother will have will be a brilliant umbrella, no other umbrella will be able to defeat him, he will be the destroyer of great Kshatriyas and Shahrukh who is for you will make your sons great ascetics, calm, devoted and best Brahmins.Saying this, Prem Anand Ritika went to the dense forest and he started doing penance every day. At that time, King Gandhi, while visiting on a pilgrimage with his wife, came to meet his daughter at the English Munni's ashram. Satyavati had taken both the four from the sage. Taking them in her hand, she requested her mother. Her mother gave all the four to her daughter and accepted all the four herself. Thereafter, Satyavati conceived a creature who would destroy all the travelers. Her body had become very bright and she was a very terrifying creature to look at. The sage came to know everything about her and he said, Bhadre, your mother has taken you away by changing the four. Your son will be a hard worker and will be highly revered and your brother will be Brahma because I had established the feeling of all forms of Brahma in him through penance. Then Satyavati, pleasing her husband, said that my son should not be like this. I do not want the birth of Brahma Dham from a Maharishi like you. Hearing this, the sage said, "Papaar, I have not made such a resolution, Dada, that my son should be like this." Also, due to the father and mother, a son can be of harsh nature. On doing the yoga, Satyavati said, Muni, if you wish, you can create new people, then what is the big deal in giving birth to a worthy son, please bless me to give me a son with a peaceful and gentle nature, if the influence of all four cannot be changed otherwise, then even if a son with such a harsh nature is born, the son should never be like that. Then the Muni, giving assurance from his penance, expressed his happiness towards Satyavati and said, Sundari, I do not believe in any difference between a son or a grandson, whatever you have said will happen. Thereafter, Hoti gave birth to Bring Vashi Jaldi and then he was educated, self-controlled and had all the clothes possible. Satyavati was also a woman of the old bank, who was ready for all religions. She became famous by the name of Kaushik. This Rahu was controlled by a king named Renu, his daughter's name was Renuka, who is also called Kamali. Then, pleased with the knowledge and giving knowledge, from Renuka's house, appeared the great Brahmin animal Parshuram ji, who knew all the sciences. He was an expert in archery, a killer of Kshatriyas and was as bright as a blazing fire. He was the first of the Brahma gods to be born to Hrithik from Satyavati. He had a middle son Sunset and a younger son Suna Gandharva as his son. He was an ascetic, knowledgeable and peaceful, a typical Brahma Rishi, in reality, became a Brahma Rishi. The other name of the virtuous Vishwamitra was Vishwa Artha. Vishwamitra had many sons like Devarat etc. who were known all over the world. Their names are told as follows: Devavrat, founder of Katyani gotra, Gati Hiranyaksha, Renu, Renu's Sanskrit throat, Mridul Madhu Kshetra, Jai Deval, Ashtak Kashyap and all the Vishrams of Kartik were the sons of Mitra. The famous gotras of these great men are as follows: Pahaaini Brahmin, blessed be the economic Devraj years, Mahakaal Lohia, knowledge of Harit and Astra. In this year, the relation of Brahmin and Chhatri is famous. Pune is considered the eldest among the sons of Vishwamitra. This goddess was born in 20 days yesterday. DP He belonged to Kaushik gotra. He was brought as an animal in the yajna of Harish Dal but the gods dedicated him to Vishwamitra. Due to being given by the gods, he became famous by the name Devart. Vishwamitra had many sons like Devart. Ashtak was born from the womb of Vishwamitra's wife Dureti. The son of Ashtak is said to be Loge. In this way I have described the wheat bridge. After this I will describe the lineage of Mahatma Ayu.
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